चालीहा महोत्सव _ श्रद्धावान लभते ज्ञानम्' अर्थात् श्रद्धा रखने वाला ही ज्ञान प्राप्त करता है यह ...... श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का* अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है

श्रद्धावान लभते ज्ञानम्' अर्थात् श्रद्धा रखने वाला ही ज्ञान प्राप्त करता है यह ......  श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का* अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है 

जप तप सेवा कर्म शुभ, तीर्थ दान स्नान, श्रद्धा बिन फल देत नहिं, कह टेऊँ सत् मान*..........दोहा क्रमांक 35 श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ पृष्ठ क्रमांक 793 शान्ति के दोहे

धमतरी _ आइस ऑफ छत्तीसगढ़ _,चलिये श्रद्धा धार, प्यारे सत्संग में,सत्संग तन मन शीतल करहैं, पाप ताप को शीघ्र हरहैं, देवे अनन्द अपार,सत्संग में हरि का रंग लागे, अविद्या निद्रा से मन जागे, पावे तत्त्व विचार,सत्संग है निज मोक्ष द्वारा, सत्संग बिन ना हो निस्तारा। कहते ग्रन्थ पुकार, कहे टेऊँ सत्संग सुखदाई, जांकी महिमा श्रीपति गाई, गावत पुनि षट् चार*........श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ पृष्ठ क्रमांक 256 राग पीला भजन क्रमांक 40 

अपने 55 वर्ष की अल्प आयु के दौरान अनेकों भजनों का गान  एवं  सत्संग के माध्यम से  मानव कल्याण किया एवं उस अनुभवी ज्ञान के महासागर को अमरापुर वाणी में पिरोकर श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ की रचना की जिसके द्वारा आज भी उस वाणी को गाकर सुनाकर जीवों का कल्याण करने का कार्य जारी है ऐसे महान संत शीरोमणि आचार्य प्रवर स्वामी टेऊँराम जी महाराज के  चालीहा महोत्सव के छठवें दिन के चालीसा पाठ एवं सत्संग का आयोजन *वाधवानी परिवार के द्वारा चार पीढ़ियों ने मिलकर कराया* आदरणीय वयोवृद्ध  दादा श्री फूलचंद के पुत्र महेश कुमार पोते लक्की एवं परपोते रियांश वाधवानी को यह सौभग्य प्राप्त हुआ 

रविवार के सत्संग में संत लोकेश जी ने आचार्यश्री के द्वारा श्रद्धा के महत्व के लिए लिखे दोहे *जप तप सेवा कर्म शुभ, तीर्थ दान स्नान, श्रद्धा बिन फल देत नहिं, कह टेऊँ सत् मान* का उल्लेख किया एवं श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक *'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'* जिसका अर्थ है श्रद्धा रखने वाला ही ज्ञान प्राप्त करता है का वर्णन किया एवं आचार्य श्री के द्वारा श्रद्धा की महत्ता को उभारने हेतु रचित भजन  *चलिये श्रद्धा धार, प्यारे सत्संग में,सत्संग तन मन शीतल करहैं, पाप ताप को शीघ्र हरहैं, देवे अनन्द अपार,सत्संग में हरि का रंग लागे, अविद्या निद्रा से मन जागे, पावे तत्त्व विचार,सत्संग है निज मोक्ष द्वारा, सत्संग बिन ना हो निस्तारा। कहते ग्रन्थ पुकार, कहे टेऊँ सत्संग सुखदाई, जांकी महिमा श्रीपति गाई, गावत पुनि षट् चार* को मधुर वाणी एवं राग में गाकर सुनाया एवं बताया कि श्रद्धा माने किसी के गुणों या महानता के प्रति मन में छिपा हुआ गहरा आदर भाव श्रद्धा है ईश्वर या गुरु के प्रति संपूर्ण समर्पण का भाव श्रद्धा है जब तक ऐसा समर्पण भाव दिल में नहीं आएगा तब तक सत्संग जप तप सेवा कर्म शुभ, तीर्थ दान स्नान आदि जितने भी सुकार्य हैं उनका फल प्राप्त नहीं होगा जब भी कोई जिज्ञासु पूर्ण श्रद्धा को ह्रदय में भरकर सत्संग सुनता है तो सत्संग के प्रभाव से उसके पापों का नाश होता है जिससे उसके तन मन में शीतलता का आगमन होता है जो उसे अपार आनन्द का अनुभव कराती है,आचार्यश्री ने इस भजन की अंतिम पंक्ति में यह फ़रमाया है कि जब पूर्ण श्रद्धा भाव से आप सत्संग सुनते हैं तो यह दिव्य सत्संग ज्ञान को बढ़ावा देता है और अज्ञानता को दूर करने में मदद करता है। *सत्संग के सुखद प्रभाव का वर्णन भगवान विष्णु (श्रीपति) द्वारा भी किया गया है और इसका गुणगान चार वेदों और छह शास्त्रों द्वारा भी किया जाता है।

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