प्रेम प्रकाश आश्रम में बह रही चालीहा की बहार,"मीरा को गिरिधर नागर भाया "_ संत लोकेश साईं
सब्र का अनोखा ताज अपने सिर पर धारण करने वाले एवं जो रचाई राम ने उस पर सदैव प्रसन्न रहने वाले साथ ही इसी सब्र एवं शुक्र से पूर्ण इस शिक्षा को देकर *"जो बनाए ईश्वर तुम ताहीं पर राजी रहो जा बनी सा है भली सब यों सदा मुख से कहो"* अपने शिष्यों को निहाल करने करने वाले आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊॅंराम जी महाराज के 139 वें जन्मोत्सव के सुअवसर पर जारी चालीहा महोत्सव के *17 वें दिन का सत्संग एवं चालीसा पाठ के कार्यक्रम का आयोजन अमरापुरवासी श्रीमाधवदास जी लखवानी के सुपुत्रों के परिवार ने मिलकर श्री प्रेम प्रकाश आश्रम परिसर पर ही कराया गया
कार्यक्रम के समापन के बाद उपस्थित सभी भक्तों को भोजन कराकर स्वामी टेऊॅंराम जी महाराज के दिल के भाव भजन भोजन साथ साथ को साकार किया* 17 वें दिन के सत्संग में सन्त लोकेश कुमार जी ने हरि नाम की धुनि लगाई *"गिरिधर नागर कहती मीरा सूर को श्यामल भाया तुकाराम और नामदेव ने विठ्ठल विठ्ठल गाया श्री राधे गोबिंदा मन भजले हरि का प्यारा नाम है"* इस धुनि में यह बताया गया है कि *मीरा को गिरिधर नागर भाया* उससे प्रीति कर उसके भजन से श्री कृष्ण को पाया *सूरदास को श्याम* ने बहुत लुभाया जिसकी उन्होंने अनुपम भक्ति की एवं उस कृष्ण मुरारी को प्राप्त किया *भक्त तुकाराम एवं भक्त नामदेव ने भी विट्ठल विट्ठल पुकार पुकार कर हरि को प्राप्त किया* श्री राधे गोबिंदा हरि के नाम का निरन्तर सिमरन करो ये *हरि नाम बहुत प्यारा है इसको भजने वालों के सारे कष्ट विघ्न नष्ट होते हैं एवं हरि उनको दर्शन देकर अपनी शरण प्रदान कर *निहाल कर देते हैं
* आचार्य सद्गुरु *स्वामी टेऊॅंराम जी महाराज ने भी अपने गुरुदेव स्वामी आसूराम जी महाराज से अटूट प्रीति कर हरि नाम का सदैव आधार लिया जाप किया एवं परमात्मा से मिल परमात्मा के ही रूप हो गए* प्रेम प्रकाश मण्डल के वर्तमान अध्यक्ष सद्गुरु स्वामी भगत प्रकाश जी महाराज ने 17 वें दिन संदेश दिया है कि *आचार्य जी ने प्रभु परमात्मा को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट बाधाओं का सामना किया उन कष्टों को दुखों को सहन करने हेतु सब्र किया सब्र का अनोखा ताज अपने सिर पर धारण किया एवं दुखों कष्टों विघ्नों से अपने को विचलित नहीं किया बल्कि उन बाधाओं पर राम की रचाई लीला समझ प्रसन्न रहे एवं उनका यह सोच कर शुक्र किया कि जा बनी है सा है भली एवं अपने आप को मान एवं अपमान के द्वंद्व से पृथक कर लिया एवं सब्र एवं शुक्र को अपनाकर सभी द्वंद्व से अपने को ऊपर रख केवल ईश्वर की भक्ती की* इसी अनुभव को सबको शिक्षा के रूप में देकर ईश्वर के प्राप्ति की सरल राह बताई




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