धमतरी के स्वामी टेऊॅंराम नगर में स्थित प्रेम प्रकाश आश्रम में जारी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मनेष्ठी आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊॅंराम जी महाराज के चालीहा महोत्सव के चतुर्थ दिवस चालीसा पाठ एवं सत्संग के कार्यक्रम का आयोजन श्री नारायणदास वाशानी के सुपुत्र नित नेमी प्रेमी श्री प्रकाश वाशानी के परिवार के द्वारा आयोजित किया गया जिसमें आश्रम के सन्त लोकेश जी ने आचार्य जी के दयालुता निर्मानता उदारता के गुणों को बताया पूज्य आचार्य चरणों ने अपने अनुभव की वाणी से लोगों का उद्धार किया उन्होंने गुरुदेव की महिमा का सर्वत्र प्रचार किया एवं गुरु नाम गुरु के मंत्र की शक्ति से लोगों को अवगत कराया *पशुओं ते मानुष किया, मानुष से किया देव , कह टेऊॅं गुरु देव ते, कीना अलख अभेव* अर्थात गुरु के मंत्र में इतनी शक्ति है कि उसके प्रताप से पशु से जीव, मनुष्य एवं मनुष्य से, देवता भी बन सकता है गुरु की कृपा पाकर वह परमात्मा से मिल उसी का रूप हो जाता है *वह परमात्मा जो अलख अभेव है अर्थात अदृश्य है जिसको न तो इन नेत्रों से देखा जा सकता है और न ही उसका भेद किया जा सकता है वह अभिन्न है उसका अनुभव तो किया जा सकता है परन्तु उसके बारे में वाणी से कथन नहीं किया जा सकता है वह अवर्चनीय है* उसको मात्र गुरु नाम के सहारे ही प्राप्त किया जा सकता है आप भाग्यशाली हैं जो आपको दुर्लभ मनुष्य का जीवन मिला है साथ ही आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊॅंराम जी महाराज आपको गुरु रूप में प्राप्त हुए है आप उनकी शरण में आए है उनके उपदेशों को अभी से आत्मसात करें अपने भाग्यशाली जीवन एवं बेशकीमती समय एवं स्वासों का आज से अभी से ही सदुपयोग करना शुरू करें नाम के सिमरन में अपने मन की वृत्ति को अभी से जोड़े क्योंकि जो *हमारे स्वास चल रहे हैं उनका कोई भरोसा नहीं कब ये चलते चलते रुक जाएं जीवन क्षणिक है मात्र चार दिन का ही है अर्थात इसके चार भाग हैं एक भाग बचपन एक भाग बुढ़ापा जिसमें जवानी का समय दो भाग माने दो दिन का ही है इसलिए इसी जवानी में अपने मन को नाम सिमरन में लगा लें बच्चों को भी भक्त प्रहलाद की भांति बाल्यकाल से ही भजन के पथ पर चलना सिखाएं यदि बाल्यकाल एवं जवानी में हमने शुभ कर्म नहीं किए तो बुढ़ापे में तो यह संभव ही नहीं है क्योंकि बुढ़ापे में अपना शरीर भी अपना नहीं रहता अर्थात साथ नहीं देता जीवन पराधीन हो जाता है जीव इस अवस्था में कुछ भी नहीं कर पाता तो भजन सत्संग परोपकार नाम सिमरन कैसे कर पाएगा यह कार्य वृद्धावस्था में कठिन हो जाएगा अभी जवानी में करना आसान है* इसलिए गुरू महराज जी यह हमें समझा भी रहे हैं एवं चेताते हुए आगाह कर रहे हैं कि संभल जाओ अज्ञान की नींद से जागो , आलस्य छोड़ो क्योंकि समय बीतता जा रहा है पल पल आयु क्षीण होती जा रही है एवं स्वांस भी निरन्तर कम होते जा रहे है, वे ना जाने कब रुक जाएं इसीलिए अभी से अपने मन को प्रभु परमात्मा की ओर *केवल नाम सिमरन कर अपनी आत्मा जो परमात्मा ही है उसका साक्षत्कार करने के लिये आगे बढ़े एवं सेवा सत्संग परोपकार के कार्य करते करते अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करें*



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