बॉर्डर की रातों में घूमती दो परछाइयाँ

बॉर्डर की रातों में घूमती दो परछाइयाँ


प्रतीकात्मक फोटो 

धमतरी _टीम आइस ऑफ छत्तीसगढ़ _कहानी उड़ीसा......छत्तीसगढ़ सीमा के बॉर्डर इलाक़े की है......जहाँ रातें भी दिन की तरह जागती हैं। कहते हैं, हर बार धान खरीदी का मौसम आते ही यहाँ दो रहस्यमयी परछाइयाँ सक्रिय हो जाती हैं। स्थानीय लोग इन्हें मज़ाक में “जुड़वा परिंदे” कहते हैं, लेकिन मज़ाक के पीछे छिपी हकीकत हमेशा हंसी नहीं होती। ग्रामीणों के अनुसार, ये दोनों लंबे समय से एक अदृश्य वसूली तंत्र चलाते आ रहे हैं और यह खेल साल भर नहीं, बल्कि मौसम के हिसाब से चाल बदलता रहता है। 

बॉर्डर से बॉर्डर… लगातार सफ़र

दिन हो, रात हो, सुबह हो या फिर सांझ इनकी सवारियाँ लगातार बॉर्डर की सड़क पर मंडराती दिखती हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरी सीमा किसी अदृश्य निगरानी में कैद हो । कहते हैं, धान खरीदी शुरू होने से पहले ही—राज्य की सीमाओं के पार कई व्यापारियों के साथ गुप्त बैठकें होती हैं। कौन सा धान कहाँ जाएगा? किस रास्ते से जाएगा? किसकी गाड़ी रुकेगी और किसकी नहीं—सब पहले से तय।“

"नजराना” नहीं दिया… तो कैमरा चालू!

कई व्यापारियों का कहना है कि यदि कोई इस अनौपचारिक “प्रवेश टैक्स” को स्वीकार न करे, तो उसकी गाड़ियाँ अजीब तरह से अचानक कैमरे में कैद होती दिखाई देती हैं। बस कुछ तस्वीरें, कुछ वीडियो… और फिर “कार्रवाई की चेतावनी ”एक तरह से “अदृश्य चौकी” जो दिखाई नहीं देती, लेकिन सबको दिखाई देती है। 

एक हटाया गया, दूसरा अब भी सक्रिय

कुछ समय पहले ग्रामीणों ने हिम्मत करके इसकी शिकायत उस  सम्माननीय “संस्था” तक दर्ज भी कराई जिसे इस गतिविधि का कथित “आधिकारिक आधार” बताया जाता रहा ,जानकारी है कि इस शिकायत के बाद जोड़ी में से एक सदस्य को “पावर से वंचित” कर दिया गया। जो अब दूसरे पवार जोन में है

लेकिन दूसरा!
वह तो जैसे इस खेल का असली खिलाड़ी हो,आज भी उसी जोश से मैदान में सक्रिय।
 

आधी रात की तस्वीरें

कहा जाता है कि ग्रामीणों के फ़ोन में अब कई तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं आधी रात की, सुनसान रास्तों की, चलती कारों की, और उन्हीं दो परछाइयों की…आज हालात इतने हैं कि क्षेत्र के लोग चुप रहने के मूड में अब बिल्कुल नहीं हैं। खबर है कि वे फिर से दस्तावेज़, फोटो, वीडियो लेकर शिकायत दर्ज करने की तैयारी में हैं।

खेल हुआ रोमांचक, अब आर पार का बिगुल फूंका गया

इन परछाइयां की बार-बार की बेवजह  धमकी चमकी से अब  ग्रामीणों ने आर पार की लड़ाई का मन बना लिया है अब देखना होगा कि अब आगे क्या?  क्या यह खेल कभी रुकेगा? क्या कोई इस अदृश्य तंत्र को उजागर करेगा? या यह मौन बॉर्डर आगे भी इन्हीं परछाइयों का रास्ता बनेगा? समय बताएगा लेकिन इतना तय है कि ग्रामीण अब दर्शक नहीं रहना चाहते।

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